जुलाई के आंकड़े देखें तो अब तक विदेशी निवेशक यानी FPI ने भारतीय शेयर बाजार से ₹21,185 करोड़ के शेयर बेच दिए हैं। वहीं घरेलू निवेशकों ने सिर्फ ₹711 करोड़ की खरीदारी की है। सवाल यह है कि जब भारतीय अर्थव्यवस्था ठीक दिख रही है, डॉलर कमजोर हो रहा है, फिर भी FPI बाजार से पैसा क्यों निकाल रहे हैं?
इस लेख में हम जानेंगे कि इसके पीछे कौन-कौन से कारण हैं, और क्या वाकई कोई बड़ा संकट आने वाला है?

विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली – चिंता का कारण
आमतौर पर जब अमेरिकी डॉलर मजबूत होता है तो विदेशी निवेशक उभरते बाजारों से पैसा निकालते हैं। लेकिन इस बार उल्टा हो रहा है। डॉलर इंडेक्स पिछले तीन महीनों में सबसे निचले स्तर पर है, इसके बावजूद एफपीआई भारत से पैसे निकाल रहे हैं।
22 जुलाई को ही FPI ने ₹3,548 करोड़ के शेयर बेच डाले। इससे साफ है कि वे अभी भारतीय शेयर बाजार में बने रहने को लेकर आश्वस्त नहीं हैं। अगर यही ट्रेंड जुलाई के आखिर तक जारी रहा, तो यह महीना FPI निकासी के लिहाज से साल का तीसरा सबसे बड़ा महीना बन सकता है।
बाजार का ऊंचा वैल्यूएशन – निवेशकों को लग रहा है डर
दूसरा बड़ा कारण है कि भारतीय बाजार अब महंगे वैल्यूएशन पर पहुंच चुका है। जेफरीज की एक रिपोर्ट के मुताबिक MSCI इंडिया इंडेक्स का मौजूदा वैल्यूएशन पिछले 10 सालों के औसत से करीब 1.5 गुना ज्यादा है।
दूसरे उभरते देशों की तुलना में भी भारत में स्टॉक्स प्रीमियम पर ट्रेड कर रहे हैं। ऐसे में विदेशी निवेशक सोचते हैं कि अभी निवेश करने से बाद में नुकसान हो सकता है। इसलिए वे मुनाफा कमा कर धीरे-धीरे बाहर निकल रहे हैं।
भारत-अमेरिका व्यापार समझौते की अनिश्चितता
भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौते को लेकर बातचीत जारी है, लेकिन अब तक कोई ठोस नतीजा सामने नहीं आया है। 1 अगस्त की डेडलाइन से पहले किसी समझौते की उम्मीद अब कमजोर होती दिख रही है।
खासकर कृषि और डेयरी प्रोडक्ट्स पर टैरिफ को लेकर दोनों देशों के बीच सहमति नहीं बन पा रही है। भारतीय प्रतिनिधिमंडल हाल ही में बिना किसी ठोस नतीजे के लौटा है। इस अनिश्चितता का असर सीधे तौर पर बाजार पर भी पड़ रहा है। विदेशी निवेशक बड़ी डील्स और स्थिर नीतियों की तलाश में रहते हैं, और जब तक यह स्पष्टता नहीं आती, वे निवेश को लेकर झिझकते रहेंगे।
कंपनियों के कमजोर तिमाही नतीजे भी चिंता की वजह
वित्तीय वर्ष 2025 की पहली तिमाही के नतीजे आ चुके हैं, और इनमें से कई कंपनियों का प्रदर्शन उम्मीद से कमज़ोर रहा है। पिछली तिमाही में जहां मुनाफा अच्छा रहा था, वहीं इस बार कंपनियां सतर्क रुख अपना रही हैं।
कई कंपनियां अब खर्च में कटौती, टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल और वेंडर कंसोलिडेशन जैसी रणनीतियां अपना रही हैं। लेकिन सबसे बड़ी चिंता की बात है डिमांड की स्थिति। अगर लोगों की खरीदारी कम रही, तो कंपनियों का मुनाफा घटेगा और बाजार में गिरावट आ सकती है।
निष्कर्ष: उम्मीद और डर दोनों साथ
हालांकि बाजार में यह तेजी घरेलू निवेशकों की वजह से आई है, लेकिन यह कहना जल्दबाज़ी होगी कि बाजार अब संभल चुका है। विदेशी निवेशकों की बिकवाली अभी भी जारी है और यह चिंता बढ़ा रही है।
हालांकि कुछ विदेशी निवेशक अब भी प्राइमरी मार्केट (IPO आदि) में दिलचस्पी दिखा रहे हैं, लेकिन बड़ी मात्रा में बिकवाली यह संकेत दे रही है कि वे बाजार को लेकर आश्वस्त नहीं हैं। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि घरेलू निवेशक इस बिकवाली का मुकाबला कितनी देर तक कर पाते हैं।
F.A.Q.
– विदेशी निवेशक भारतीय शेयर बाजार से पैसा क्यों निकाल रहे हैं?
इसकी तीन मुख्य वजहें हैं — बाजार का ऊंचा वैल्यूएशन, भारत-अमेरिका व्यापार समझौते में अनिश्चितता और कंपनियों के कमजोर तिमाही नतीजे। निवेशक जोखिम लेने से बच रहे हैं और मुनाफा बुक कर रहे हैं।
– जुलाई 2025 में अब तक विदेशी निवेशकों ने कितनी बिकवाली की है?
जुलाई 2025 में अब तक विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार से करीब ₹21,185 करोड़ की बिकवाली की है, जो एक चिंता का विषय है।
– क्या भारतीय शेयर बाजार में बड़ी गिरावट आ सकती है?
अगर विदेशी निवेशकों की बिकवाली ऐसे ही जारी रही और कंपनियों के नतीजे कमजोर रहे, तो बाजार में गिरावट की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता। हालांकि घरेलू निवेशक अब तक बाजार को सहारा दे रहे हैं।
– क्या अभी शेयर बाजार में निवेश करना सही रहेगा?
यह पूरी तरह निवेशक की जोखिम क्षमता और लंबी अवधि की रणनीति पर निर्भर करता है। अभी सतर्क रहकर वैल्यूएशन के हिसाब से निवेश करना ज़्यादा समझदारी होगी।
– क्या विदेशी निवेशक पूरी तरह से भारत से बाहर जा रहे हैं?
नहीं, विदेशी निवेशक अभी भी प्राइमरी मार्केट (IPO आदि) में रुचि दिखा रहे हैं। वे उन शेयरों में निवेश कर रहे हैं जहां वैल्यूएशन उचित है। लेकिन कैश मार्केट में वे फिलहाल सतर्क हैं।
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