भारत में सोना और चांदी सिर्फ धातु नहीं हैं। ये बचत, परंपरा और सुरक्षा से जुड़े हुए हैं। शादी, त्योहार और खास मौकों पर सोना-चांदी खरीदना आम बात है। लेकिन जब बात निवेश की आती है, तो सवाल बदल जाता है, क्या आज के समय में सोना चांदी खरीदना समझदारी है?
यहां भावनाओं से हटकर, निवेश के नजरिए से बात करते हैं।

सोना चांदी के कीमतें क्यों बदलती रहती हैं
सोना और चांदी की कीमतें रोज बदलती हैं। इसके पीछे कई कारण होते हैं- डॉलर की चाल, ब्याज दरों के फैसले, वैश्विक तनाव, और मुद्रास्फीति का डर। जब शेयर बाजार में अनिश्चितता बढ़ती है, तो लोग सुरक्षित विकल्प की तरफ जाते हैं। उस समय सोने में खरीद बढ़ती है।
चांदी पर एक और असर भी होता है औद्योगिक मांग। अगर उद्योगों में मांग बढ़ी, तो चांदी का भाव तेज चल सकता है। मांग घटे तो कीमत दब सकती है।
इसलिए दोनों धातुओं को सिर्फ एक ही नजर से नहीं देखना चाहिए।
सोना: स्थिरता के लिए जाना जाता है
निवेश की दुनिया में सोने को अक्सर सुरक्षा कवच माना जाता है। जब मुद्रा कमजोर होती है या महंगाई बढ़ती है, तब सोना कई बार अपनी वैल्यू बनाए रखता है। यही कारण है कि बड़े निवेशक भी अपने पोर्टफोलियो में थोड़ा हिस्सा सोने का रखते हैं।
सोने की एक खास बात यह है कि इसे बेचना आसान होता है। लगभग हर शहर में ज्वैलर्स या बैंक इसे खरीद लेते हैं।
लेकिन एक सच्चाई यहां भी है सोना खुद से कमाई नहीं करता। न कोई ब्याज, न डिविडेंड। कमाई तभी होगी जब कीमत बढ़ेगी। इसलिए इसे ग्रोथ निवेश नहीं, बैलेंस निवेश मानना ठीक है।
चांदी: मौका भी, उतार-चढ़ाव भी
चांदी का स्वभाव सोने से अलग है। इसकी कीमतों में ज्यादा हलचल देखी जाती है। वजह यह है कि चांदी का बड़ा उपयोग उद्योगों में होता है इलेक्ट्रॉनिक्स, सोलर पैनल, मेडिकल उपकरण और नई ऊर्जा तकनीक में।
इसका मतलब साफ है अगर औद्योगिक मांग बढ़ी तो चांदी ऊपर जा सकती है। लेकिन मांग धीमी हुई तो दबाव भी आ सकता है।
जो निवेशक उतार-चढ़ाव सह सकते हैं, उनके लिए चांदी एक हिस्सा हो सकती है। लेकिन इसे पूरी तरह सुरक्षित विकल्प मानना सही नहीं।
भौतिक खरीद या डिजिटल तरीका
आज सोना और चांदी खरीदने के तरीके बदल चुके हैं। सिर्फ दुकान से सिक्का या गहना खरीदना ही विकल्प नहीं है।
पहला तरीका है भौतिक खरीद ज्वैलरी, कॉइन या बार। यह हाथ में दिखता है, इसलिए कई लोगों को भरोसा रहता है। लेकिन इसमें मेकिंग चार्ज, GST और शुद्धता का सवाल जुड़ा होता है। बेचते समय ये लागत वापस नहीं मिलती।
दूसरा तरीका है डिजिटल गोल्ड या सिल्वर। कई ऐप के जरिए आप छोटी रकम से भी खरीद सकते हैं। स्टोरेज की चिंता नहीं रहती। लेकिन प्लेटफॉर्म चुनते समय नियम और चार्ज समझ लेना जरूरी है।
तीसरा तरीका है ETF। यह शेयर बाजार के जरिए खरीदा जाता है। लागत कम होती है और खरीद-फरोख्त आसान रहती है। जिनके पास डीमैट खाता है, उनके लिए यह सीधा विकल्प है।
कितना हिस्सा रखना ठीक है
यहां एक सामान्य नियम काम आता है किसी भी एक एसेट में पूरा पैसा नहीं लगाना चाहिए। सोना-चांदी को कुल निवेश का छोटा हिस्सा रखना बेहतर रहता है। कई सलाहकार 5 से 15 प्रतिशत के बीच का दायरा ठीक मानते हैं, लेकिन यह आपकी जरूरत और जोखिम सहने की क्षमता पर निर्भर करता है।
अगर आपका लक्ष्य लंबी अवधि की सुरक्षा और संतुलन है, तो सोना ज्यादा उपयुक्त बैठता है। अगर आप कीमतों की चाल पर नजर रख सकते हैं और उतार-चढ़ाव से घबराते नहीं, तो चांदी का छोटा हिस्सा जोड़ा जा सकता है।
अभी खरीदें या इंतजार करें
यह सवाल हर निवेशक के मन में आता है। सच यह है कि किसी भी एसेट का सही समय पकड़ना आसान नहीं। एक तरीका यह है कि पूरी रकम एक साथ लगाने के बजाय धीरे-धीरे खरीदें। इससे औसत कीमत संतुलित रहती है।
अगर कीमतें बहुत ऊंचे स्तर पर लग रही हैं, तो किस्तों में खरीद बेहतर रहती है। अगर हाल में गिरावट आई है और आपकी योजना लंबी अवधि की है, तो छोटी शुरुआत की जा सकती है।
निष्कर्ष
सोना और चांदी दोनों का अपना रोल है, लेकिन दोनों अलग काम करते हैं। सोना संतुलन और सुरक्षा के लिए, चांदी अवसर और चाल के लिए। इन्हें जरूरत से ज्यादा महत्व देना भी ठीक नहीं, और पूरी तरह नजरअंदाज करना भी नहीं।
अपने लक्ष्य, समय अवधि और जोखिम क्षमता को सामने रखकर फैसला लें। निवेश में स्पष्ट सोच अक्सर बड़े फैसलों से ज्यादा काम आती है।
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